“Exempting Pfizer from any civil liability for serious side effects resulting from the use of the vaccine, indefinitely “

The Federal Government / Ministry of Health reports that it did receive the letter from the CEO of Pfizer, as well as meeting several times with its representatives. However, despite all the media power promoted by the laboratory, the initial doses offered to Brazil would be another marketing, branding and growth achievement for the vaccine producer, as has been happening in other countries. For Brazil, on the other hand, it would cause frustration in all Brazilians, since we would have, with few doses, to choose, in a continental country with more than 212 million inhabitants, who would be the ones chosen to receive the vaccine.

However, not only the frustration that the company Pfizer would cause to the Brazilians, the leonine and abusive clauses that were established by the laboratory create a barrier of negotiation and purchase. As an example, we cite five excerpts from the pre-contract clauses, which have already been widely publicized by the press:

1) That Brazil renounces the sovereignty of its assets abroad in favor of Pfizer as payment guarantee, as well as constitutes a guarantee fund with amounts deposited in an account abroad;

2) The departure from Brazilian jurisdiction and laws with the institution of an arbitration agreement under the laws of New York, in the United States;

3) That the first and second batches of vaccines be 500 thousand doses and the third one million, totaling 2 million in the first quarter, with the possibility of delayed delivery (a number considered insufficient by Brazil);

4) if there is a delay in delivery, there is no penalty; and

5) That a term of responsibility for any possible side effects of the vaccine be signed, exempting Pfizer from any civil liability for serious side effects resulting from the use of the vaccine, indefinitely.

After the Federal Government acquired all the initial production of the Butantan vaccine (from Sinovac) – 46 million doses -, with an option to purchase an additional 54 million, having received 2 million doses from Astrazeneca / Oxford from India, with an option to import of more doses, in addition to the production of this vaccine by Fiocruz of 100.4 million doses in the first semester and another 110 million doses in the second semester, also considering the possibility of acquiring 42.5 million doses through the Covax Facility mechanism, Pfizer representatives try to deconstruct an immunization work that is already happening across the country. Creating embarrassing situations for the Brazilian Government, which will not accept market impositions – which will also not be accepted by Brazilians.

In no time, the Federal Government, through the Ministry of Health, closed its doors to Pfizer. In all dealings, we expect a different positioning of the laboratory, which includes a viable and satisfactory delivery, taking into account the strategies of the National Plan for the Operationalization of Vaccination against Covid-19, an action of market values ​​and fair legal application that serves both parties .

In addition to Pfizer, with which the Brazilian Government continues to negotiate, other laboratories are already at an advanced stage of negotiations with Brazil, within the established principles and standards.

It is worth mentioning the fact that, in addition to the aspects already mentioned, it is the only vaccine that needs to be stored and transported between -70 ° C and -80 ° C, with an interval of three weeks between the first and second doses.

In addition, the laboratory does not provide the diluent for each dose – which would be borne by the buyer.

Although the laboratory created a solution for the conservation of doses during transport (a styrofoam box lined with non-impermeable cardboard, which was presented to us at the end of November, on that occasion with the conservation information for 15 days) and offered to make the logistics from the arrival of the USA to the point designated by the Ministry of Health, together with CONASS and CONASEMS, Pfizer would not be responsible for the replacement of the dry ice refill – which must be replaced every five days (they informed that the conservation would be 30 days in the month of December). In the contacts of August, September and October, the alternative of the thermal box had not yet been presented to us.

In addition, Pfizer has not yet submitted the draft of its contract – as requested in previous opportunities and, in particular at the meeting held on the morning of January 19 – nor does it have a protocol forecast date for the authorization request for emergency use or even registration with the National Health Surveillance Agency (Anvisa).

(Source : Note issued by Ministry of Health Brazil Government on 23 January 2021)

आधुनिक भारत और भगतसिंह ; भाग – 1

भगतसिंह के बारे में तो हम सब जानते है कि वे महान स्वतंत्रता सेनानी थे, पर बहुत कम लोग यह जानते है कि, वे एक क्रांतिकारी विचारधारा वाले स्वतन्त्रता सेनानी थे। शहीद – ए – आज़म सरदार भगतसिंह के लेखों से यह ज्ञात होता है कि, अगर हम जनसमूह की आमधारणा की बात करें तो हम यह पाएंगे की भारत में गत 100 साल में कुछ ज़्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है। वर्तमान भारत में हर आयुवर्ग के लोगों की यह समस्या है कि, वह किताबों से दूर हो गया और वह तथ्यों को जानने की ज़हमत उठाना नहीं चाहता। इसका नतीज़ा यह हुआ कि, भारतीय समाज़ एक अलग ही तरह से बंट गया है और इस बंटवारें के लिए मुल्क के हुक्मरानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

अगर आप सरदार भगतसिंह के लेखों को पढ़ें तो आपको लगेगा वे भारत के वर्तमान परिदृश्य की ही बात कर रहे है। भगतसिंह जून 1927 में किरती में छपे एक लेख के माध्यम से कहते है,
जहाँ तक देखा गया है सांप्रदायिक दंगों के पीछे अख़बारों और नेताओं का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वे नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सरों पर उठाया हुआ था और जो समान राष्ट्रीयता की दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपना सर छुपाये बैठे है या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले है। जो नेता हृदय के सबका भला चाहते हो, वे बहुत कम है।

अखबार वालों को सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाला बता कर वे कहते है कि,
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत गन्दा हो गया है। यह लोग एक – दुसरे के विरुद्ध बड़े मोठे छोटे शीर्षक देकर लोगों की भवनायें भड़काते है और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते है। एक दो जगह नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे।

अख़बारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों को संकीर्णता से निकलना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना है। लेकिन इन्होने अपना मूल कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संर्कीणता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगडे करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है ।

सांप्रदायिक दंगों की जड़ों को खोदा जाये तो इनका कारन आर्थिक ही जान पड़ता है। विश्व में जो भी काम होता है उसकी तह में पेट का सवाल अवश्य होता है। वे आगे कहते है कि, दंगों को इलाज यदि हो सकता है तो , वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है। भूख और दुःख से आतुर मनुष्य सभी सिद्धांत ताक पर रख देता है।

सरदार भगतसिंह बड़े – बड़े विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखते है और आपको उनके विचारों को पढ़ कर यह प्रतीत होगा की वह आज ही की बात कर रहे है। आज हमारे देश के नेता क्या कर रहे है ? मीड़िया की भूमिका और दायित्व समाज के प्रति क्या है ? क्यों देश में धार्मिक सौहार्द एक विचित्र सी स्तिथि में है ? कहीं देश में यह कोलाहल पूंजीपतियों के कारण तो नहीं ? भगतसिंह के लेख के इस अंश में सभी सवालों के जवाब निहित है। फैसला हमें करना है, आखिर यह देश हमारा है और जैसे संविधान ने हमें मूल अधिकार दिए है वैसे हमारे इस देश के पार्टी मूल कर्तव्य भी है।

आधुनिक कौन है ?

Dogs & Indians are not Allowed युवा पीढ़ी इस विषय में कम ही जानती होगी। अंग्रेज़ स्वयं को भारतीयों के मुकाबले ज़्यादा सभ्य मानते थे और जिसका परिणाम था की भारतीयों का बहुत से स्थानों पर प्रवेश वर्जित था। स्वयं को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति हर व्यक्ति में विद्यमान है और यह कहना गलत ना होगा की हम स्वयं को किसी न किसी से तो श्रेष्ठ मान कर ही जी रहे है। इस भेदभाव करने वाली मनुष्य की प्रवृत्ति की जड़ें इतनी गहरी है कि, मानवीय मूल्यों से कई अधिक महत्व चमड़ी से रंग को दे दिया जाता है, जात – पात, अमीरी-गरीबी, सामाजिक प्रभुत्व आदि बात तो दूर की है । हम मानव स्वयं को उत्कृष्ट मानने के मोह में इस तरह अंधे है की हम चमड़ी के गोरे और काले होने के पीछे का वैज्ञानिक तर्क भी नहीं समझ पाते। खैर मानव के विकास और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के विषय में हम कभी और बात करेंगे।

तथाकथित सभ्य समाज या वह ग्रामीण जो नए नए शहरी बने है या वह युवा जो अभी अभी शराब या धूम्रपान करने लगे है , व्यसनहीन और सरलता से जीवनयापन करने वालों को कई मायने में निकृष्ठ समझते है। ग्रामीणों का उल्लेख यहाँ इसलिए आवश्यक है, क्यूंकि भारत की आत्मा आज भी ग्रामों में ही बसती है। मैं पिछले एक दशक से भी अधिक से आदिवासी समुदाय के प्रत्यक्ष संपर्क में हूँ और इस समाज की आधुनिक परम्परायें किसी को भी हतप्रभ कर सकती है। मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि इस लेख को पढ़ने के पश्चात् आपके लिए आधुनिक समाज की परिभाषा ही बदल जायेगी । 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजाति की कुल आबादी 10.43 करोड़ है, इनमें से 89.97 % आबादी ग्रामों में और 10.03 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करती है। लिंगानुपात के मामले में अनुसूचित जनजाति समुदाय तथाकथित विकसित और सभ्य समाज को पीछे छोड़ देता है, जो 99 % है अर्थात 1000 पुरुषों के अनुपात में 990 महिलाएं।

विवाह प्रथा

निमाड़ के आदिवासी समुदाय में दहेज़ प्रथा का एक विकसित रूप देखने को मिलता है। इस प्रथा के अनुसार वर के परिवार वाले वधु को दहेज़ देते है, इस दहेज़ में कुछ पैसे, कुछ चाँदी और कुछ बकरे अनिवार्य रूप से सम्मिलित होते है। वधु पक्ष को जो पैसे दहेज़ के रूप में प्राप्त होता है उस से वह विवाह समारोह का व्यय वहन करते है, प्राप्त चाँदी के ज़ेवर बना कर वह वधु को देते है और बकरे बारातियों की दावत में काम आते है। इस प्रकार बेटी का जन्म आदिवासी समुदाय में कोई बोझ नहीं होता। वधुपक्ष अपनी और से भी विवाह समारोह में होने वाले खर्च में आंशिक रूप से भागीदार अवश्य होता है, परन्तु तथाकथित सभ्य समाज और आधुनिक समाज की तुलना के सापेक्ष में यह खर्च नगण्य है।

औषधीय ज्ञान

आदिवासी समुदाय का औषधीय ज्ञान अद्भुत है। लोह गल, पत्थर चट्टा, काला सिरिस, धवा , बेग साग, चिरायता, अडूसा , हड़जोरा, महुआ, बेलफल,आंवला आदि का उपयोग दमा, पशुओ द्वारा धातु निगलने की स्तिथि में, पथरी , जले का इलाज, रक्त अल्पतता, नाक से खून आना, पेट के कीड़ों को मारने, अत्यधिक पेशाब जाने, उच्च रक्तचाप आदि रोगों के उपचार किया जाता है। परन्तु यह उत्कृष्ट ज्ञान और परिष्कृत उपचार विधि युवाओं की उदासीनता के चलते अब विलोपन की कगार पर है। इस प्रकार का परिष्कृत ज्ञान शहरों में तो दिखाई ही नहीं देता, हल्दी की उपयोगिता के अलावा मनुक्का, खारक, शहद, मुलेठी, लौंग, काली मिर्च , दाल चीनी अब सिर्फ मसाले बन कर रह गए है।

भोजन प्रबंधन

क्या आपको 2015 में रतन टाटा का भोजन के सम्बन्ध का में किया गया ट्वीट याद है ? कोशिश कीजिये शायद आपको याद आ जाये। जर्मनी में खाना ऑर्डर करा हुआ खाना पूरा नहीं खाने के कारण उन्हें 50 यूरो का जुर्माना देना पड़ा था और जुर्माना करने वाले अधिकारी ने उन्हें कहा था ” पैसा आपके पास हो सकता है, पर संसाधन समाज के होते है”। सीधी सी बात है कि, जुर्माना लगाने का उद्देश्य नागरिकों को खाना व्यर्थ करने से रोकना था। शायद आपको यकीन ना हो परन्तु जब आदिवासी किसी खास अवसर पर या सामन्यतः बकरा मारते है तो वह, किसी न किसी रूप से हड्डियों को छोड़ कर सबकुछ सबकुछ पका लेते है, यह पकवान तुरंत खाने के लिए या कई दिन तक खाये जाने के किये तैयार किये जाते है। बहुत से लोगों को यह अजीब लग सकता है पर बकरे की चमड़ी, आतें , अमाशय, आदि सब कुछ पका कर या तो तुरंत खा लिया जाता है या बाद में खाने के लिए बचा लिया जाता है।

आधुनिक कानून व्यवस्था

एक समाचार माध्यम में प्रकाशित समाचार के अनुसार भारत में कुल 3 करोड़ 97 लाख 91 हज़ार 286 मामलें सितम्बर 2020 तक लंबित थे। हम सब इस बात से भलीभाँति परिचित है कि, न्यायलय से न्याय प्राप्त होने में कितना वक़्त लग जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि, आदिवासी समुदाय की अपनी ही एक न्यायालीन व्यवस्था है। निमाड़ क्षेत्र में आदिवासी समुदाय में न्यायाधीश को प्रचलित भाषा में पटेल कहा जाता है। यह गांव का मुख्य न्यायाधीश होता है और आपको यह जान कर हैरानी होगी की गाँव के पटेल की सहमति के बिना बारात भी गाँव में प्रवेश नहीं कर सकती है। अगर आपराधिक और फौजदारी प्रकरणों के निपटारे की बात करें तो, आधुनिक न्यायप्रणाली भारत में लागु होने के बहुत समय बाद तक यह प्रथा आज भी आदिवासी अंचलों में देखी जा सकती है। वर्तमान में यह आंतरिक न्याय व्यवस्था एक सीमित क्षेत्र में या मात्रा में न्याय व्यवस्था से कुछ बोझ दूर करती अवश्य नज़र आती है।

अत्याधुनिक विलुप्तप्राय सिंचाई प्रणालीआदिवासीयों द्वारा विकसित की गयी सिंचाई तकनीक गुरत्वाकर्षण के नियम को धता बताती नज़र आती है । यहां पानी को आवश्यकता अनुसार मोड़ कर पहाड़ी पर स्थित अपने खेतों में बिना किसी आधुनिक उपकरण के पानी ले जाते है । इस तकनीक को यहां “पाट” प्रणाली कहा जाता है और हम इसे उद्ध्वंत सिंचाई या लिफ्ट इरीगेशन के नाम से जानते है।

हर किसी के मन में यह प्रश्न आयेगा की ऐसा करना तो लगभग ना मुमकिन है, बिना किसी उपकरण की मदद के,  गुरत्वाकर्षण के नियम के विरूद्ध पानी को कई मीटर ऊपर पहाड़ो को कैसे ले जाया जा सकता है ? पाट सिंचाई प्रणाली में नीचे की और बहाने वाले किसी नाले या नदी का चयन कर उस समभूमि की तलाश की जाती  है जो खेत की उंचाई के समानांतर हो । इस स्थान पर मिट्टी और पत्थरों की मदद से एक बाँध बनाया जाता है । पानी को रोकने की व्यवस्था कर लेने के बाद नालियों के माध्यम से किनारे किनारे खेत तक पानी ले जाया जाता है । यहां नालियों के निर्माण में आदिवासियों की अपकेंद्री और अभिकेन्द्री बल की नैसर्गिक समझ पानी को खेतो तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । इन नालियों के निर्माण में जहां जहां बड़े गढ्डे आते है वहां पेड़ो के खोखले तनो को पाइप की तरह इस्तेमाल करके  पानी के लिए रास्ता बनाया जाता है ।

इन नालियों को विकेन्द्रित कर छोटी नालियों के माध्यम के अलग अलग खेतों में पानी पहुँचाया जाता है । आपको यह जान कर हैरानी होगी की इस प्रणाली के माध्यम से 30 – 40 हार्सपाँवर की क्षमता के समकक्ष सिंचाई की जा सकती है, अर्थात एक 5 हार्सपाँवर की विद्युत मोटर 1 घंटे में 40,000 लीटर पानी उत्सर्जित करती है, तो इस प्रणाली से लगभग एक घंटे में 2,40,000 लीटर पानी एक घंटे में प्राप्त किया जा सकता है । सामन्यात: 1 हेक्टेयर में गेंहू, मक्का आदि फसलो को पूर्ण रूप से तैयार करने में 12 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है । आप कल्पना कर सकते है की कृषि को सरल बनाने की यह कितनी युक्तिसंगत प्रणाली है । 

चाहे दुर्गम स्थलों पर दो अलग अलग आकार के बैलों के माध्यम से कृषि करना हो, चाहे चिड़िया का घोसलां देख कर वर्षा ऋतू का पता लगाना भारत का ग्रामीण विशेषतः आदिवासी कितना आधुनिक है यह समझा ही जा सकता है।

म्यूच्यूअल फण्ड सही या नहीं ?

” म्यूच्यूअल फण्ड सही नहीं है ” कोरोना संकट से जूझ रहे भारत देश में आजकल सोशल मीडिया पर आपने यह नारा अकसर देखा होगा। इस नारे के साथ निवेशकों को प्रॉपर्टी (Real Estate) में निवेश हेतु प्रेरित किया जा रहा है। मैं यह दावे से कह सकता हूँ कि, अगर आपने भी इस तरह का प्रचार देखा है तो आपको भी लगा होगा की बात तो सही है, म्यूच्यूअल फण्ड (Mutual Fund) है तो शेयर बाज़ार में निवेश का ही एक रूप और शेयर बाज़ार (Stock Market) का क्या भरोसा ?

क्या आपकी भी यही धारणा ? अधिकतर भारतीय निवेशक बाज़ार में जोख़िम उठाने से बचते है। भारतीय निवेशक अधिकतर सावधि जमा योजना (Fixed Deposit), आवर्ती जमा योजना (Recurring Deposit), भारतीय जीवन बीमा द्वारा संचालित किसी योजना, भारतीय डाक (Indian Post) की योजनाओं में निवेश करना पसंद करते है और शेयर बाज़ार की तुलना में इन विकल्पों को कई अधिक सुरक्षित मानते है।

एक साधारण निवेशक यह भूल जाता है कि, जो पूँजी (Capital) वह बैंक में जमा कर रहा है वह बैंक कमाने हेतु किसी को कर्ज के रूप में दी जा सकती है या सरकार की किसी वृहद परियोजना में निवेश की जा सकती है या फिर बैंक इसे किसी राजहुंडी (Treasury Bill) में निवेश कर सकते है या फिर बैंक भी इसे शेयर बाजार में प्रत्यक्ष या अप्रयत्क्ष रूप में निवेश कर सकता है आदि। ऐसी स्तिथि में मान लीजिये अगर बैंक को निवेश का मूल्य नहीं मिला तो आपकी पूँजी की स्तिथि क्या होगी ?यस बैंक (Yes Bank) इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है।

सबसे सुरक्षित माने जाने विकल्प के बाद, बात करते है जंगम सम्पति (Immovable Property) में निवेश की, इस क्षेत्र में सन 1992 के बाद एक देखी गयी। उदारीकरण नीति के लागु होने के बाद शहरों का स्वरुप तेज़ी बदलने लगा और देश में विदेशी निवेश (Foreign Investment) और बहुराष्ट्रीय संस्थाओं (Multi National Companies) की बाढ़ से आ गयी साथ ही साथ भारतीय निजी क्षेत्र को विदेश पूँजी निवेश (Foreign Direct Investment) का बहुत लाभ हुआ। आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) और एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) के मुनाफे वृद्धि इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

इस दौर में जंगम सम्पत्तियों के भाव आसमान छूने लगे और प्रापर्टी व्यवसाय पंक्तिबद्ध मकानों (Row House), बहुमंजिला इमारतों , फार्म हाउस व्यवसाय, उपनगर परियोजनाओं (Township Schemes) के माध्यम से खूब मुनाफा कमाने लगा। भारत के रियल एस्टेट उद्योग में वर्ष 2012 – 2013 के मध्य सर्वाधिक तेजी दर्ज की गयी थी जो लगभग 17.5 के आसपास थी और उसके यह दर लगातार गिरती चली गयी। सन 2016 में यह तेज़ी -2.06 तक नीचे गिर गयी थी। वर्तमान परिदृश्य की बात की जाए यह दर लगभग 1.5 प्रतिशत की है। अगर विभिन्न सूचकांक या रियल स्टेट में मूल्य वृद्धि पर नज़र रखने वालों की माने तो 2011 में आपके द्वारा निवेश किया गया 100 रुपया आज सन 2020 में 225 रुपये के बराबर है।

अब बात करते है महंगाई कि, साधारण उदाहरण है कि, सन 2010 में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत ₹51.53 और 24 जून 2020 को दिल्ली में पेट्रोल का भाव है ₹ 79.53 अर्थात कीमतों में 154 प्रतिशत की वृद्धि। लाज़मी है की अगर ईंधन के मूल्य में वृद्धि होगी तो अन्य उत्पादों के मूल्य में वृद्धि होना सामान्य है, ऐसे में प्रॉपर्टी या रियल स्टेट में निवेश से प्राप्त आय का क्या मूल्य रह जाता है, यह सबसे बड़ा प्रश्न है।

साथ ही साथ रियल स्टेट उद्योग में तरलता (Liquidity) का आभाव इसके मूल्य में गिरावट का प्रमुख कारण है। अगर आप आपातलकाल की स्तिथि में अपनी संपत्ति बेचने जायेंगे तो सबसे पहले खरीदार ढूंढना मुश्किल, खरीदार मिल जाये तो उचित बाज़ार भाव मिलना मुश्किल साथ की साथ वैध मूल्य वैध रूप से मिलना मुश्किल आदि समस्याएं इस निवेश को वास्तव में जंगम बना देती है।

अब बात करते है म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश की, आपने किसी कर में छूट (Tax Saver) प्रदान करने वाले फण्ड में निवेश किया है, उदाहरण तौर पर आपने आदित्य बिरला सनलाइफ टैक्स रिलीफ, 96 (ABSL Tax Relief, 96) में 100 रूपये निवेश किया होता तो इसका मूल्य लगभग 264 रुपये होता, साथ ही साथ आपको कर में भी छूट मिलती।

Source : Value Research

म्यूच्यूअल फण्ड आपको तरलता (Liquidity) प्रदान करता है परन्तु अगर यह निवेश बाजार आधारित फण्ड में है और आपने अभी अभी SIP प्रारम्भ की है तो आपके निवेश का मूल्य आधा भी हो सकता है। म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश लम्बी अवधि के लिए करना ही ठीक है। अगर आप छोटी अवधि के लिए या स्थायी मुनाफे के लिए निवेश कर रहे है तो, Liquid Fund या Debt Fund आपके लिए बेहतरीन विकल्प सिद्ध हो सकते है।

Source : Value Research

आप देख सकते है की, यह स्थायी मुनाफा है बाजार की उथल-पुथल का इस फण्ड पर कोई प्रभाव नहीं है। इसका फण्ड का मुनाफा प्रॉपर्टी में होने वाले मुनाफे से कम है परन्तु यह स्थायी है और मात्र 48 घंटे में आपका पैसा मुनाफे के साथ आपके खाते में होता है। Liquid Fund के मामले में 50,000 रुपये या 90 प्रतिशत जो भी कम हो तत्काल आपके खाते में ट्रांसफर हो जाते है।

अंत में तो यह निवेशक का ही विवेक तय करता है कि, निवेश का उचित विकल्प क्या है ?

बीमा : सामान्य परिचय और इतिहास

अगर आप किसी से पूछें कि, भाई क्या आपने बीमा करवा रखा है या क्या आपके पास कोई स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) है, तो मान कर चलिए की सामान्य व्यक्ति कहेगा नहीं या आपको 10 में से 9 लोग इस प्रश्न का उत्तर ना में ही देंगे। बहुत से लोगों ने जो शासकीय सेवा में कार्यरत है ने सिर्फ इसलिए बीमा करा रखा है कि, इस कारण आयकर (Income Tax ) में छूट मिलती है।

क्या आपके मन में यह विचार नहीं आता की बीमा की शुरुआत कैसे और कहाँ हुई होगी ? वह कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जिसके मन में बीमा करने का ख्याल आया होगा ? क्या इस बीमा प्रणाली का जन्म भारत (India) में हुआ है ? ऐसे बहुत से सामन्य और रोचक सवालों के जवाब आपको इस लेख में मिलेंगे।

बीमा या इन्शुरन्स (Insurance) शब्द से कौन परिचित नहीं है, पिछले दो दशक ने इस उद्योग को बदल कर रख दिया है। इस उद्योग की जड़ें 3000 ईसा पूर्व में बेबीलॉन फैली हुई है। यह माना जाता है कि, यहाँ के समुद्री व्यापारी जो साहूकारों से कर्ज लिया करते उस पर अधिक ब्याज़ दिया करते थे। यह अतिरिक्त धन इस बात को सुनिश्चित करता था कि, समुद्री यात्रा के दौरान जहाज़ डूब जाने पर, लूटेरों द्वारा जहाज़ लूट लिए जाने पर कर्ज लेने वाले को साहूकार को किसी भी राशि का भुगतान नहीं करना होगा।

भारत में गुजरात के व्यापारी भी इस युक्ति का सहारा लेकर श्रीलंका आदि देशों में व्यपार किया करते थे। यह तो हुई प्राचीन इतिहास की बात अब करते है, पिछली 4 शताब्दियों की, लंदन में 17 वीं सदी में लगी भीषण आग (Great Fire of Landon) ने आधुनिक बीमा जगत की नींव रखी और सन 1680 में फायर स्टेशन (Fire Station) नामक बीमा कंपनी की नींव रखी गयी। आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि, फिर से ऐसी आग लग जाती तो क्या नई बीमा कंपनी नुकसान की भरपाई कैसे करती या फिर की बीमा ही क्यों, कोई और तरीका जैसे बॉन्ड या कोई गारंटी क्यों नहीं ?

इसका एक सबसे प्रमुख कारण यह है कि, बीमा दो पक्षों के हित को ध्यान में रख कर किया जाता है, यह दो पक्ष बीमित और बीमा प्रदाता है। बीमा कभी भी एक पक्षीय हित को साधने वाला नहीं होता। अगर बीमा अवधि में सम्बंधित बीमित परिसंपत्ति की हानि होती है तो बीमित को क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है और अगर कोई हानि नहीं होती तो बीमा प्रदाता प्रीमियम की राशि रख सकता है जो उसका मुनाफा है।

बीमा प्रदाता हमेशा किसी घटना के होने की सम्भावना की गणना के आधार पर बीमा प्रदान करता है और प्रीमियम (Premium) का मूल्य इस बात पर तय होता है कि, उस घटना के होने कितने आसार है। यह तो तय है कि, लन्दन में लगी भीषण आग के बाद वहां रहवासी आग के खतरों के पार्टी अधिक जागरूक हुए होंगे और साथ – साथ ऐसी घटना हो इस प्रयास में भी व्यक्तिगत रूप से कार्यरत रहे होंगे। सीधा अर्थ है कि, भविष्य में ऐसी घटना होने की संभावना काम हो जाती है, तो एक सामान्य सी राशि नागरिकों से लेकर, उन्हें सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। यह तो हुई प्रीमियम की बात।

बीमा भी म्यूच्यूअल फण्ड (Mutual Fund) से मिलता जुलता ही है। म्यूच्यूअल फण्ड मुनाफा कमाने के इच्छुक व्यक्तियों के आंशिक निवेश से निर्मित एक फण्ड है जो इस राशि को मुनाफा सृजित करने वाली इकाइयों में निश्चित समयवधि के लिए किया जाता है। ठीक इस प्रकार बीमा प्रीमियम के माध्यम से एकत्र राशि का वह फण्ड है जो प्रीमियम प्रदाताओं को परिसंपत्ति के हानि होने पर क्षतिपूर्ति प्रदान करता है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है की बीमा कुछ लोगों के नुक्सान को में बाँट देता है या बहुत से लोग मिल कर कुछ लोगों को हुए नुकसान की भरपाई कर देते है।

भारत के परिपेक्ष्य में बात की जाए तो भारत में ओरिएण्टल इन्शुरन्स (Oriental Insurance) पहली जीवन बीमा करने वाली कंपनी थी जिसकी नींव 1818 में कलकत्ता में राखी गयी थी। इसके बाद 1850 में भारत की पहली सामन्य बीमा (General Insurance) कंपनी ट्रिनटन (Trinton) की नींव रखी गयी।

इसके बाद स्वदेशी कंपनी बॉम्बे म्यूच्यूअल अशुरन्स कंपनी (Bombay Mutual Assurance Company) की नींव सन 1870 में रखी गयी, इसके बाद सन 1906 में नेशनल इन्शुरन्स (National Insurance) कंपनी अस्तित्व में आयी। इसके बाद 1938 में बीमा सम्बन्धी नियमों को इम्पीरियल असेंबली (Imperial Assembly) कानूनी रूप देते हुए बीमा अधिनियम 1938 (Insurance Act, 1938) पारित किया गया। भारत की आज़ादी के बाद बीमा उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया जिसके परिणाम स्वरुप 1 सितम्बर 1956 को भारतीय जीवन बीमा निगम (Life Insurance Corporation of India) की नींव पड़ी और इस संस्था ने सन 2000 तक भारतीय बीमा जगत पर एक छत्र राज किया।

यह कहना बिलकुल गलत न होगा की भारत के जनता में बीमा उद्योग पर जो विश्वास है वह एलआईसी के कारण ही है। भारत में वर्तमान में 24 जीवन बीमा कंपनियां कार्यरत है और 34 संस्थायें जनरल इन्शुरन्स में कार्यरत है। आशा है आपको यह लेख पसंद आया होगा। बीमा सम्बंधित किसी भी जानकारी के लिए

+91 844 845 4427 पर whatsapp या कॉल करें।