आधुनिक भारत और भगतसिंह ; भाग – 1

भगतसिंह के बारे में तो हम सब जानते है कि वे महान स्वतंत्रता सेनानी थे, पर बहुत कम लोग यह जानते है कि, वे एक क्रांतिकारी विचारधारा वाले स्वतन्त्रता सेनानी थे। शहीद – ए – आज़म सरदार भगतसिंह के लेखों से यह ज्ञात होता है कि, अगर हम जनसमूह की आमधारणा की बात करें तो हम यह पाएंगे की भारत में गत 100 साल में कुछ ज़्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है। वर्तमान भारत में हर आयुवर्ग के लोगों की यह समस्या है कि, वह किताबों से दूर हो गया और वह तथ्यों को जानने की ज़हमत उठाना नहीं चाहता। इसका नतीज़ा यह हुआ कि, भारतीय समाज़ एक अलग ही तरह से बंट गया है और इस बंटवारें के लिए मुल्क के हुक्मरानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

अगर आप सरदार भगतसिंह के लेखों को पढ़ें तो आपको लगेगा वे भारत के वर्तमान परिदृश्य की ही बात कर रहे है। भगतसिंह जून 1927 में किरती में छपे एक लेख के माध्यम से कहते है,
जहाँ तक देखा गया है सांप्रदायिक दंगों के पीछे अख़बारों और नेताओं का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वे नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सरों पर उठाया हुआ था और जो समान राष्ट्रीयता की दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपना सर छुपाये बैठे है या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले है। जो नेता हृदय के सबका भला चाहते हो, वे बहुत कम है।

अखबार वालों को सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाला बता कर वे कहते है कि,
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत गन्दा हो गया है। यह लोग एक – दुसरे के विरुद्ध बड़े मोठे छोटे शीर्षक देकर लोगों की भवनायें भड़काते है और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते है। एक दो जगह नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे।

अख़बारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों को संकीर्णता से निकलना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना है। लेकिन इन्होने अपना मूल कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संर्कीणता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगडे करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है ।

सांप्रदायिक दंगों की जड़ों को खोदा जाये तो इनका कारन आर्थिक ही जान पड़ता है। विश्व में जो भी काम होता है उसकी तह में पेट का सवाल अवश्य होता है। वे आगे कहते है कि, दंगों को इलाज यदि हो सकता है तो , वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है। भूख और दुःख से आतुर मनुष्य सभी सिद्धांत ताक पर रख देता है।

सरदार भगतसिंह बड़े – बड़े विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखते है और आपको उनके विचारों को पढ़ कर यह प्रतीत होगा की वह आज ही की बात कर रहे है। आज हमारे देश के नेता क्या कर रहे है ? मीड़िया की भूमिका और दायित्व समाज के प्रति क्या है ? क्यों देश में धार्मिक सौहार्द एक विचित्र सी स्तिथि में है ? कहीं देश में यह कोलाहल पूंजीपतियों के कारण तो नहीं ? भगतसिंह के लेख के इस अंश में सभी सवालों के जवाब निहित है। फैसला हमें करना है, आखिर यह देश हमारा है और जैसे संविधान ने हमें मूल अधिकार दिए है वैसे हमारे इस देश के पार्टी मूल कर्तव्य भी है।

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