आधुनिक कौन है ?

Dogs & Indians are not Allowed युवा पीढ़ी इस विषय में कम ही जानती होगी। अंग्रेज़ स्वयं को भारतीयों के मुकाबले ज़्यादा सभ्य मानते थे और जिसका परिणाम था की भारतीयों का बहुत से स्थानों पर प्रवेश वर्जित था। स्वयं को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति हर व्यक्ति में विद्यमान है और यह कहना गलत ना होगा की हम स्वयं को किसी न किसी से तो श्रेष्ठ मान कर ही जी रहे है। इस भेदभाव करने वाली मनुष्य की प्रवृत्ति की जड़ें इतनी गहरी है कि, मानवीय मूल्यों से कई अधिक महत्व चमड़ी से रंग को दे दिया जाता है, जात – पात, अमीरी-गरीबी, सामाजिक प्रभुत्व आदि बात तो दूर की है । हम मानव स्वयं को उत्कृष्ट मानने के मोह में इस तरह अंधे है की हम चमड़ी के गोरे और काले होने के पीछे का वैज्ञानिक तर्क भी नहीं समझ पाते। खैर मानव के विकास और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के विषय में हम कभी और बात करेंगे।

तथाकथित सभ्य समाज या वह ग्रामीण जो नए नए शहरी बने है या वह युवा जो अभी अभी शराब या धूम्रपान करने लगे है , व्यसनहीन और सरलता से जीवनयापन करने वालों को कई मायने में निकृष्ठ समझते है। ग्रामीणों का उल्लेख यहाँ इसलिए आवश्यक है, क्यूंकि भारत की आत्मा आज भी ग्रामों में ही बसती है। मैं पिछले एक दशक से भी अधिक से आदिवासी समुदाय के प्रत्यक्ष संपर्क में हूँ और इस समाज की आधुनिक परम्परायें किसी को भी हतप्रभ कर सकती है। मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि इस लेख को पढ़ने के पश्चात् आपके लिए आधुनिक समाज की परिभाषा ही बदल जायेगी । 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजाति की कुल आबादी 10.43 करोड़ है, इनमें से 89.97 % आबादी ग्रामों में और 10.03 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करती है। लिंगानुपात के मामले में अनुसूचित जनजाति समुदाय तथाकथित विकसित और सभ्य समाज को पीछे छोड़ देता है, जो 99 % है अर्थात 1000 पुरुषों के अनुपात में 990 महिलाएं।

विवाह प्रथा

निमाड़ के आदिवासी समुदाय में दहेज़ प्रथा का एक विकसित रूप देखने को मिलता है। इस प्रथा के अनुसार वर के परिवार वाले वधु को दहेज़ देते है, इस दहेज़ में कुछ पैसे, कुछ चाँदी और कुछ बकरे अनिवार्य रूप से सम्मिलित होते है। वधु पक्ष को जो पैसे दहेज़ के रूप में प्राप्त होता है उस से वह विवाह समारोह का व्यय वहन करते है, प्राप्त चाँदी के ज़ेवर बना कर वह वधु को देते है और बकरे बारातियों की दावत में काम आते है। इस प्रकार बेटी का जन्म आदिवासी समुदाय में कोई बोझ नहीं होता। वधुपक्ष अपनी और से भी विवाह समारोह में होने वाले खर्च में आंशिक रूप से भागीदार अवश्य होता है, परन्तु तथाकथित सभ्य समाज और आधुनिक समाज की तुलना के सापेक्ष में यह खर्च नगण्य है।

औषधीय ज्ञान

आदिवासी समुदाय का औषधीय ज्ञान अद्भुत है। लोह गल, पत्थर चट्टा, काला सिरिस, धवा , बेग साग, चिरायता, अडूसा , हड़जोरा, महुआ, बेलफल,आंवला आदि का उपयोग दमा, पशुओ द्वारा धातु निगलने की स्तिथि में, पथरी , जले का इलाज, रक्त अल्पतता, नाक से खून आना, पेट के कीड़ों को मारने, अत्यधिक पेशाब जाने, उच्च रक्तचाप आदि रोगों के उपचार किया जाता है। परन्तु यह उत्कृष्ट ज्ञान और परिष्कृत उपचार विधि युवाओं की उदासीनता के चलते अब विलोपन की कगार पर है। इस प्रकार का परिष्कृत ज्ञान शहरों में तो दिखाई ही नहीं देता, हल्दी की उपयोगिता के अलावा मनुक्का, खारक, शहद, मुलेठी, लौंग, काली मिर्च , दाल चीनी अब सिर्फ मसाले बन कर रह गए है।

भोजन प्रबंधन

क्या आपको 2015 में रतन टाटा का भोजन के सम्बन्ध का में किया गया ट्वीट याद है ? कोशिश कीजिये शायद आपको याद आ जाये। जर्मनी में खाना ऑर्डर करा हुआ खाना पूरा नहीं खाने के कारण उन्हें 50 यूरो का जुर्माना देना पड़ा था और जुर्माना करने वाले अधिकारी ने उन्हें कहा था ” पैसा आपके पास हो सकता है, पर संसाधन समाज के होते है”। सीधी सी बात है कि, जुर्माना लगाने का उद्देश्य नागरिकों को खाना व्यर्थ करने से रोकना था। शायद आपको यकीन ना हो परन्तु जब आदिवासी किसी खास अवसर पर या सामन्यतः बकरा मारते है तो वह, किसी न किसी रूप से हड्डियों को छोड़ कर सबकुछ सबकुछ पका लेते है, यह पकवान तुरंत खाने के लिए या कई दिन तक खाये जाने के किये तैयार किये जाते है। बहुत से लोगों को यह अजीब लग सकता है पर बकरे की चमड़ी, आतें , अमाशय, आदि सब कुछ पका कर या तो तुरंत खा लिया जाता है या बाद में खाने के लिए बचा लिया जाता है।

आधुनिक कानून व्यवस्था

एक समाचार माध्यम में प्रकाशित समाचार के अनुसार भारत में कुल 3 करोड़ 97 लाख 91 हज़ार 286 मामलें सितम्बर 2020 तक लंबित थे। हम सब इस बात से भलीभाँति परिचित है कि, न्यायलय से न्याय प्राप्त होने में कितना वक़्त लग जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि, आदिवासी समुदाय की अपनी ही एक न्यायालीन व्यवस्था है। निमाड़ क्षेत्र में आदिवासी समुदाय में न्यायाधीश को प्रचलित भाषा में पटेल कहा जाता है। यह गांव का मुख्य न्यायाधीश होता है और आपको यह जान कर हैरानी होगी की गाँव के पटेल की सहमति के बिना बारात भी गाँव में प्रवेश नहीं कर सकती है। अगर आपराधिक और फौजदारी प्रकरणों के निपटारे की बात करें तो, आधुनिक न्यायप्रणाली भारत में लागु होने के बहुत समय बाद तक यह प्रथा आज भी आदिवासी अंचलों में देखी जा सकती है। वर्तमान में यह आंतरिक न्याय व्यवस्था एक सीमित क्षेत्र में या मात्रा में न्याय व्यवस्था से कुछ बोझ दूर करती अवश्य नज़र आती है।

अत्याधुनिक विलुप्तप्राय सिंचाई प्रणालीआदिवासीयों द्वारा विकसित की गयी सिंचाई तकनीक गुरत्वाकर्षण के नियम को धता बताती नज़र आती है । यहां पानी को आवश्यकता अनुसार मोड़ कर पहाड़ी पर स्थित अपने खेतों में बिना किसी आधुनिक उपकरण के पानी ले जाते है । इस तकनीक को यहां “पाट” प्रणाली कहा जाता है और हम इसे उद्ध्वंत सिंचाई या लिफ्ट इरीगेशन के नाम से जानते है।

हर किसी के मन में यह प्रश्न आयेगा की ऐसा करना तो लगभग ना मुमकिन है, बिना किसी उपकरण की मदद के,  गुरत्वाकर्षण के नियम के विरूद्ध पानी को कई मीटर ऊपर पहाड़ो को कैसे ले जाया जा सकता है ? पाट सिंचाई प्रणाली में नीचे की और बहाने वाले किसी नाले या नदी का चयन कर उस समभूमि की तलाश की जाती  है जो खेत की उंचाई के समानांतर हो । इस स्थान पर मिट्टी और पत्थरों की मदद से एक बाँध बनाया जाता है । पानी को रोकने की व्यवस्था कर लेने के बाद नालियों के माध्यम से किनारे किनारे खेत तक पानी ले जाया जाता है । यहां नालियों के निर्माण में आदिवासियों की अपकेंद्री और अभिकेन्द्री बल की नैसर्गिक समझ पानी को खेतो तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । इन नालियों के निर्माण में जहां जहां बड़े गढ्डे आते है वहां पेड़ो के खोखले तनो को पाइप की तरह इस्तेमाल करके  पानी के लिए रास्ता बनाया जाता है ।

इन नालियों को विकेन्द्रित कर छोटी नालियों के माध्यम के अलग अलग खेतों में पानी पहुँचाया जाता है । आपको यह जान कर हैरानी होगी की इस प्रणाली के माध्यम से 30 – 40 हार्सपाँवर की क्षमता के समकक्ष सिंचाई की जा सकती है, अर्थात एक 5 हार्सपाँवर की विद्युत मोटर 1 घंटे में 40,000 लीटर पानी उत्सर्जित करती है, तो इस प्रणाली से लगभग एक घंटे में 2,40,000 लीटर पानी एक घंटे में प्राप्त किया जा सकता है । सामन्यात: 1 हेक्टेयर में गेंहू, मक्का आदि फसलो को पूर्ण रूप से तैयार करने में 12 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है । आप कल्पना कर सकते है की कृषि को सरल बनाने की यह कितनी युक्तिसंगत प्रणाली है । 

चाहे दुर्गम स्थलों पर दो अलग अलग आकार के बैलों के माध्यम से कृषि करना हो, चाहे चिड़िया का घोसलां देख कर वर्षा ऋतू का पता लगाना भारत का ग्रामीण विशेषतः आदिवासी कितना आधुनिक है यह समझा ही जा सकता है।

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